न्यूज़ रात तक कार्तिक पूर्णिमा पर शिव योग बन रहा है। कार्तिक पूर्णिमा पर शिव योग रात्रि 11.39 बजे तक है। इस योग में गंगा स्नान और भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्त को मृत्युलोक में स्वर्गलोक के समान सुख प्राप्त होता है। हिन्दु पञ्चांग एवं खगोलीय स्थिति के अनुसार, चंद्रमा 28 दिनों में पृथ्वी का एक चक्कर पूर्ण करता है। 15 दिनों के उपरांत चंद्रमा पृथ्वी की एक छोर से दूसरी की छोर पर होता है। जब चंद्रमा भारतवर्ष की ओर होता है, तब उसे पूर्ण अवस्था मे देखा जाता है। जब चंद्रमा पूर्ण स्वरूप से भारतवर्ष मे दिखाई देता, उस दिन को ही पूर्णिमा का दिन कहा जाता है। और यह घटना(पूर्णिमा) प्रत्येक स्थान अथवा देश के लिए चंद्रमा की स्थिति के अनुसार अलग-अलग समय पर हो सकती है। पूर्णिमा व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए चंद्रमा के उदय समय की विशेष महत्ता है।
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बता दे की पूर्णिमा प्रत्येक माह की शुक्ला पक्ष मे आने वाला मासिक उत्सव है, अतः पूर्णिमा वर्ष मे 12 बार, तथा अधिक मास की स्थिति मे 13 बार भी हो सकती है। पूने, पूरणमासी, पूनम ऐसे ही पूर्णिमा को विभिन्न लोक भाषाओं मे अन्य-अन्य नाम से जाना जाता है।
भारत मे, प्रत्येक माह की पूर्णिमा को कोई न कोई पर्व अवश्य मनाया जाता हैं। इन्हीं मासिक तिथियों मे, कुछ लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण पूर्णिमा तिथि श्री हनुमान जन्मोत्सव, बुद्ध पूर्णिमा, गुरू पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, कोजागरी लक्ष्मी पूजा, टेसू पूनै, वाल्मीकि जयंती, रक्षाबन्धन, श्री भैरव जयंती, देव दिवाली एवं अन्नपूर्णा जंयती, दत्त जयन्ती हैं। भारत का सबसे प्रसिद्ध रंगों भरा वाला त्यौहार होली भी फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन ही होता है।
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पूर्णिमा के दिन हिंदू व्रत, गंगा स्नान तथा सत्यनारायण जी के कथा का पाठ करते हैं। खगोलीय घटनाओं के अनुसार, पूर्णिमा के दिन समुद्र मे और दिनो से अधिक ज्वार की घटना होती है।
कार्तिक पूर्णिमा की तिथि
27 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 45 मिनट तक है। इस समय से पहले भक्त स्नान, ध्यान, पूजा, जप, तप और दान कर सकते हैं। सनातन धर्म में तिथि की गणना सूर्योदय के बाद की जाती है। इसलिए, कार्तिक पूर्णिमा 27 नवंबर को पड़ रही है।
कार्तिक पूर्णिमा पूजा विधि
कार्तिक पूर्णिमा तिथि पर ब्रह्म बेला में उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हो जाएं। इस दिन गंगाजल युक्त जल से स्नान करें। यदि सुविधाजनक हो, तो किसी नदी या झील में स्नान करें। आचमन करके स्वयं को शुद्ध कर लें और पीले रंग के वस्त्र धारण करें। साथ ही सूर्य देव को जल भी अर्पित करें। बहते जल की धारा में तिल प्रवाहित करें।
इसके बाद पंचोपचार करें और भगवान विष्णु की पूजा करें। पूजा में उन्हें पीले रंग के फल, फूल, वस्त्र आदि अर्पित करें। विष्णु चालीसा का पाठ करें और मंत्रों का जाप करें। अंत में आरती करें और भगवान से परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। ब्राह्मणों को दान करने के बाद ही भोजन करें।